हमारे शरीर के उत्त मांगो मांगों में मस्तिक प्रधान अंग है, और इसके शिर शूल, सूर्या वर्त अनंतवात मस्तक पीड़ा भ्रू पीड़ा प्रतिशय सन्निपात तथा मानसिक दुर्बलता आदि कठिन रोगों में ग्रस्त हो जाने से हमारे जीवन का सारा कार्य शिथिल पड़ जाता है और साथ ही भयंकर पीड़ा भी सहन करनी पड़ती है अतः मस्तिष्क को स्वास्थ्य वह वह निरोग रखना परम आवश्यक है

आधा शीशी की पहचान

अधिकतर या पीड़ा मस्तिक के आधे भाग में होती है इसमें पहले रोगी का सिर चकराना प्रारंभ होता है फिर आंखों के सम्मुख आग की चिंगारियां भी उड़ती हुई प्रतीत होती है और साथ ही कनपटी की रंगे तड़पने लग जाती है रोगी पीड़ा की अधिकता से दिन-रात छटपटाता है और प्रकाश से उसे गृणा हो जाती है वह निरंतर अंधकार में रहना चाहता है इन समस्याओं से आप आधशिषी भलीभांति पहचान कर सकते है

रोगों उत्पत्ति के कारण

प्राया यारों वंश परंपरागत की से होता है अर्थात यदि माता-पिता को यह रोग होता है तो उनकी संतान को भी हो जाता है किंतु कभी-कभी नजला जुकाम को ठीक ठीक चिकित्सा ना होने के कारण मस्तिक की रंगों में दूषित आद्रता रुक जाती है औरैया रक्त को वितरित करके आधासीसी की पीड़ा उत्पन्न कर देता है कब्ज होने की वजह से होता है

उपचार

पोस्ट के अनपछ नए डोडे आधी ,गेहूं की भूसी १झटंक, और पुराना गुड़१ छटांक । तीनों को रात के समय उबालकर पी लिया करे । और ३दिन निरंतर सेवा करे और लाभ होगा

महामेदा नाम का जड़ ,बेर और बाबुल के पेड़ो पर पाई जाती है इसकी बनावट ठीक नींबू जैसी होती है और वजन में बड़ी हल्की होती है (लोग कांच को साफ करने में प्रयोग करते थे) इसका १नाग लेकर ३से ४तोले गाय के घी में आग लगा भुने और जब उसका हरा रंग परिवर्तित होकर लाल हो जाए तो घी उतार लेवे तथा उस निचोड़कर फेंक दे फिर घी में यथावत खांड मिलाकर निरंतर ७दिन देने से ठीक होजाती है हर परकार सिर दर्द धिक होंजता है

Leave a Comment