जल पर आयुर्वेदिक प्रयोग

श्री भगवान धन्वंतरि जी को नमन करते हैं। आज हम जल के जल के आयुर्वेदिक प्रयोग के बारे में बात करेंगे ।जल क्या होता है ।इसका जल पर आयुर्वेदिक प्रयोग कैसे किया जाता है यह कितने प्रकार का होते हैं

जल के बारे में

जल पर आयुर्वेदिक प्रयोगका जल का स्वरूप गगन यानी आसमान से ही होता है सारा का सारा जल जिसको हम मेघ, जल ,बरसात जल या वर्षा जल कहते हैं। परंतु काल ,स्थान ,भेद ,और पात्र के या देश के आधार पर भिन्न-भिन्न रूप बदलता है जैसे आसमान एक है परंतु बरसात के मौसम में आसमान का रंग अलग होता है

शरद ऋतु , हेमंत ऋतु ,में शिशिर ऋतु और ग्रीष्म ऋतु में आकाश का जो रंग है , और उसका जो गुण धर्म है बदलता रहता है जैसे हम कभी राजस्थान जाएंगे तो आप देखेंगे चारों तरफ रेत रेत है अधिक मात्रा में गर्मी और पानी बहुत कम मात्रा में मिलता है परंतु यदि आप उत्तराखंड जाएंगे असम या नेपाल चले जाएंगे वहां पर ठंड ठंड होता है साल भर रजाई कंबल या जैकेट का प्रयोग करते हैं। कहने का अर्थ क्या है ,काल गुण, भेद ,पात्र के आधार पर हमारा जो जल वह बदल जाता है ।

जल के प्रकार

ऐसा कहते हैं जल दो प्रकार का होते हैं एक दिव्य जल होता है दूसरा भूमि जल होता है (भूमि जल भिभिन्न प्रकार के होते है)

दिव्य जल

दिव्य जल क्या होता है ।दिव्य जल को समझने, के लिए आचार्य चरक जी ने दिव्य जल को चार प्रकार से होता है।

1 धारा जल २ कारक जल 3 हिम जल 4 तोषाद जल

दिव्य जल क्या होता है

दिव्य जल में गंगा का जल श्रेष्ठ होता है ।गंगाजल को इसलिए श्रेष्ठ कहा गया है। क्योंकि इसमें पवित्रता होती है। कि जब भगवान विष्णु वामन का अवतार लेकर ,बली के द्वार पर गए थे ।उस समय दाहिने पैर के अंगूठे से, नाखून के टूट जाने पर ,वहां पर गंगा जी की उत्पत्ति हुई ,कहने का अर्थ यह है। कि भगवान विष्णु जी का जो रक्त है वही गंगा जी हैं। भगवान विष्णु जी इतनी पवित्र कि उनका रक्त सफेद है गंगा का जल श्री भगवान विष्णु जी के चरणों से निकला है।इसलिए इसलिए गंगा का जल, प्रवित्र माना जाता है

आचार्य चरक चरक जी कहते है सभी जल आकाश से आती है। उसे अंतरिक्ष जल खाद जल श्रेष्ठ जल भी कहते है और सबसे शीतल होता है (ठंडा होता है) और ये पवित्र होता है इसमें कोई धूल और मेल(गंदगी नहीं होता है इसीलिए। इस पवित्र जल बोला जाता है।

यह सबका कल्याण करने वाला होता है जन्मजात शिशु से लेकर मृत्यु पुरषों तक , आप आप देखेंगे कि राजस्थान में बरसात बहुत कम मात्रा में होती है। वहां पर आप देखेंगे बरसात के जल को इकट्ठा करने के लिए एक टैंक बनाये रहते है छत का पानी और रास्ते का जमा करते है।

साल भर उसका उपयोग करते हैं। क्योंकि बरसात का जो जल होता है 1 साल तक शुद्ध जल होता है बरसात का जल इतना स्वच्छ एव फिल्टर जैसा पानी होता है और इसमें विमल गुण पाए जाते है और एक गुण होता है लघु गुण (जो शीघ्रता से पचने वाला ) है।

गंगा का जल श्रेष्ठ और पवित्र क्यों होता है

दिखेंगे कसाए रस ,मधुरस,लघु गुण और सूखापन नही होता है। और कफ कारक भी नही होता है। गंगा जब जल कफ और सांस और हृदय को ठीक करता है । नहाने के बाद१० एमएल सोने के पहले १०ml लेना है आप देखेंगे धीरे,२ आराम मिलेगा ।

समुद्र का जल

समुद्र में तब तक नहाना चाहिए ।जब तक आंखो से आशु न आ जाए। स्नायु तंत्र ,और वायु दोष को शांत करता है।
समुद्र का जल पीना चाहिए ।

अश्विन मास में में पहला पक्ष पितृ पक्ष का होता है। और दूसरा पक्ष मातु पक्ष का होता है नवरात्रि में उपवास करना शरद पूर्णिमा के दिन (जिनको कुमार पूर्णिमा कहा जाता है ) बहुत से वैध खीर बना के देते है कई भी कफ के रोगों से मुक्त होते है। ये समुद्र का जल कफ के रोगों में मुक्त दिलाने में ये पीना चाहिए परंतु बार बार छान लेना है उसमे नमक कम हो।

ऐसा कहा गया ,कि जो नदियों का जल है ।वो सारा का सारा जल पश्चिम समुद्र में मिलती है। नदी का पानी निर्मल रहता है परंतु जो पूर्व समुद्र में मिलती है

सारा। सारा जो नदी है उसका प्रभाव बहुत कम रहता है धीरे धीरे चलने वाली है। पश्चिम समुद्र में कौन कौन सी नदी मिलती है। पश्चिम समुद्र में देखेंगे ,कि गोमती नदी मिलती है हमारे ऋषि बताते है पश्चिम की चलने वाली नदिया बहुत तेज से चलती है। यदि समुद्र का जल न मिले तो हम उस नदी का जल सेवन कर सकते है।

नदियों का जल

उससे कोई दिक्कत नही है जैसे ये अवंतीनगर उज्जैन ,और कोकन देश उड़ीसा असम ये सब राज्य में पाए जाने वाली नदिया देखेंगे धीरे धीरे बहती है ये नदियों का जल थोड़ा गुरु होता है मतलब गरिष्ट देर से पचने वाला होता है त्रिदोष नाशक भी हो सकते है

कभी कभी ये कब होते है। जब आदान काल में त्रिदोष नाशक होता है ।और विसर्ग काल में जो दक्षिणन्न जो होता है छह महीने का त्रिदोष कारक होते है और उत्तरायण में ६ महीने में त्रिदोष नाशक होते है।पूर्व दिशा में बहने वाली नदी का जल है आप उतरायण के समय में सेवन कर सकते है परंतु गंगा का जल बारह महीना आप सेवन कर साकते है।

शीतल जल मटके का जल (मिट्टी के पात्र का जल )

इसका रहस्य क्या है। जैसे मटके का जो पानी होता है ।वो शीतल होता है ।कलश या कुंभ का पानी जो मिट्टी का पानी होता है । मस्तिस्क को बल देता है हमको नींद अच्छी आतीं है ।और कैलिश्याम का जो स्तर वो बराबर रहता है । हड्डियां और मज्जा धातु को बल मिलता है ।साथ में जिनको चक्कर आता है बार बार उनको मटके का पानी पीने से धीरे धीरे आराम मिलता है। जिनको बार बार अपस्मार , मुरझा होती है या सन्यास रोग (कोमा ) में चले जाते है । किसी फिल्टर का पानी नही देना चाइए ना किसी बोल्टल का पानी ,उनको सिर्फ मटके के पानी देने से आप देखेंगे कि जो रोग है ,

धीरे धीरे मुक्ति मिल जाती है जिनको । बीपी जो है आराम मिल जायेगा। जिनको बार बार तृष्णा रोग है कितना पानी पिए लेकिन प्यास नही बुझती लेकिन उनको शीतल जल पीने से मुक्ति मिलती है

जिनको शीतपित की रोग है जिनको शरीर में जलन हो कही भी जलन हो है ।धीरे धीरे आराम मिलता है चरक जी ने लिखे जो जिंदगी भर मटके का पानी पीता है ।उसके कैंसर रोग नही होता है। हमारे पहले के जी पूर्वज थे वे बड़े चतुर और विद्वान थे ।कैंसर रोग से बचना है मिट्टी का पात्र का जल का पीना चाहिए ।(गुनगुना सरसो का तेल पैरो के तलुओं में मालिश करने detoxify होता है शरीर को डिटॉक्स करता है

और विरोधाहार करने से पित्ताशय और आमाशय में सारा विष जमा हो जाता है पैरो के तलुओं में मालिश करने समानवायु सारा का सारा विष मल द्वार के पास और मूत्राशय के पास लें जाता है जिससे सारा का सारा विष मल और मूत्र के द्वारा निकल जाता है आगर आप सरसो से तेल गुनगुना तलुओं में मालिश करते है देखेंगे आप जीवनभर चश्मे की जरूरत नहीं पड़ेगी)

गरम जल

गर्म जल सेवन करने से हमारा जठराग्नि है वो तीव्र होता है ही हम जो खाते है सही से पचता हैऔर अग्नि का दीपन होता है(रस रक्त मांस मेघा शुक्र dhatu )अग्नि हमारा जो 13 प्रकार की अग्नि होती है और पांच प्रकार की पित्त की अग्नि जो होती है सात प्रकार की अग्नि और पांच प्रकार के पित्त की(पाचक रंजक ) अग्नि और एक जठराग्नि को मिलाकर १३प्रकार की अग्नि सही हो जाते जिनकी वजह से हमेंअजीर्ण रोग पेट की कोई भी रोग नहीं होता है । आजकल तांसिल रोग और थायराइड रोग हो आप इन रोगी से पूछेंगे आप कौन सा पानी पीते है वो बोलेंगे फ्रीज का पानी पीता हु

आज कल देखेंगे ।आप किडनी के रोग दायलिश करने के परेशान होते है । ये किडनी के रोग कारण है आप गरम जल नही पीते है। गरम जल पीने से किडनी को इतना बल मिलेगा ।आप कल्पना भी नहीं कर सकते आप का जो किडनी है । अगर किडनी खराब हुआ तो आप का लीवर खराब होगा

। किडनी और लीवर दोनो खराब हुआ । स्पलिन खराब होता है अगर ये तीनो खराब होता है गुदद्वार भी विकृत होने लगती है यदि आप गुनगुना पानी पीते है ।किडनी ठीक हों जाता है सही रहता है लीवर सही रहता है स्प्लीन सही रहता है आपको पेट की सौच क्रिया की कोई समस्या नहीं रहती है ,यदि आप चाहते है किडनी मेरा कभी खराब न हो गरम पानी पिए ,और डायलिस करने ना जाना पड़े आज से ,और अभी से ,गुनगुना पानी पीना आरंभ कर दीजिए

।हिचकी बार बार आती है ।गुण गुना पानी से आराम होता है। खाना खाने के बाद जिनको पेट फूला रहता है। गुनगुना पानी पीने से ठीक हों जाता है और जिनको वात रोग है । गुनगुना पानी पीने से ठीक भी जाता है और वात रोग नही होता है कफ की समस्या कभी नही रहती है

आप जो वामन विरीचन पंचकर्म क्रिया बार बार करने की आवश्यकता नहीं होती है तीन साल में एक बार करा सकते है ।

यदि आपको ज्वर हुवा है आप गिलास गुनगुना पानी एक चम्मज काला नमक और एक नींबू निचोड़ना है जितना गरम हो सके। पीना है चाय के जैसा। काला कम्बल या काला चादर ओढ़ के सो जाना है आप देखेंगे कोई भी बुखार हो १०से१५मिनट में पसीना से बुखार उतर जाता है। जिनको खासी की समस्या हो गुनगुना पानी पिन से कुछ दिन में आराम मिलता है

आज कल आमवात होता है कमर में दर्द , पेट दर्द कोहनी में दर्द शरीर में कहीं भी दर्द होता है गुनगुना पानी पीने से 80 प्रकार का जो वात होता है वो नही होता है नाक से पानी आना नाक बढ़ जाना हड्डी बढ़ जाना , जिन्हें गंध न आ गर्म पानी पीने से आराम हो जाता है एनीमिया रोग हो जाता है गुनगुना पानी पीने से 50% रोग ठीक हो जाता है और 50% रोग औषधि सेवन करने से ठीक होता है

खाना खाते समय पानी कैसे पीना चाहिए

जैसे कि हम रोटी चावल खा रहे हैं ।दो-तीन बार खाने से थोड़ा दो घुट पानी पीना और,फिर दो-तीन बार खाने से ,दो घुट पानी पीना । यदि आपके पास तीन रोटी है दो रोटी तक यही प्रक्रिया करनी चाहिए ।उसके बाद अंत में एक दो घूंट पानी पीना चाहिए जिससे हमारी ग्रहण नाली साफ हो जाए इससे हमारा भोजन अच्छी तरह से पाचन होगा रस रक्त धातु आदि अच्छी तरह से बनेंगे ।उसके बाद ४५मिनट बाद पानी पीना चाहिए।

45 मिनट बाद पानी की क्यू पीना चाहिए जब हम भोजन करते हैं तो हमारा जो कलेदक कफ है जो नाभि के पास है वो अपना काम चालू कर देता है जैसे कि हम मुंह में एक रोटी का टुकड़ा लिया जठरगिनी ऑटोमेटिक जलने लगता है हमारा जो ग्रहण नाली है आमाशय के पास में हृदय से नाभि तक रहता है

या तो आहार नली भी कहते है। आहार नली को ग्रहण नली भी कहते हैं ।ग्रहण नली इसलिए कहा जाता है ।आप मुंह के अंदर कुछ भी डाली जैसे जहर और कोई भी खाद्य पदार्थ डाली को ग्रहण नली ग्रहण कर लेती है। वह नहीं देखेगा , यह खराब है अच्छा है यह जो ग्रहण नली खराब हो जाता है ।

दूषित हो जाता है तो इंग्लिश में ibs कहा जाता है ।जब हम कोई भी भोजन ग्रहण करते हैं तो हमारे आमाशय में सबसे पहले क्लेडक कफ बनता है जल देता रहता है (क्लेदक कफ) हमारे आमाशय को जल देता रहता है हमे हमें 45 मिनट बाद पानी पीना चाहिए क्योंकि वहां पर पाचक पित्त अपना सक्रिय होता है अग्नाशय वो भी सक्रिय हो जाता है अगर इस समय पानी नही पिया तोआपको भोजन जल जाता है इसलिए इस४५ मिनट बाद पानी पीना चाहिए

वैध श्री सत्यवान नायक जी

उपरोक्त में लिखे हुए शब्दों कोई भी त्रुटि हो तो हमें माफ करना. शिवकुमार साहू

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