पुरुष रोग चिकित्सा

पुरुष का महत्व

(पुरुष रोग )आयुर्वेद एवं वेद आदि महाग्रंथो में शरीर को महापुरुष कहा गया है जिसमें पंचमहाभूत, इंद्रियां आदि है और उसके साथ जीवात्मा प्रवेश करता है ,तब उनको पुरुष कहा गया है पुरुष शब्द से जाती भेद नहीं जाने । नर ,नारी और नपुंसक तीनों जाति पृथ्वी पर हैं, उन तीन को पुरुष शब्द से कहा गया है।लोक तथा साहित्य में पुरुष को प्रधान या स्वाधीन और स्त्री को पुरुष का पूरक तत्व या पराधीन के रूप में चित्रित किया गया है चारुदत्त कहता है _ पैसे, धन संपत्ति के कारण ही मानव पुरुष होता है वही धन ना होने से दूसरे के आश्रय में रहने वाली स्त्री की भांति पराधीन हो जाता है आप भी आंख खोल कर देखें क्या यह सच है।

बीज प्रधानम विश्व जानता है कि बीज प्रधान होता है क्षेत्र में नहीं । स्पष्ट है कि मटर के खेत में गेहूं का बीज बोया जाए तो फल या अन्न का नाम सर्वत्र गेहूं ही होगा मटर नहीं। किसी भी वाटिका का फल कहीं वाटिका के नाम से नहीं पुकारा जाता है । बीच के नाम से पुकारा जाता है जैसे आम का फल ,केला का फल आदि ।स्पष्ट वीर्य (बीज)से गर्भाधान होता है उसी के नाम से गर्भ से उत्पन्न शिशु की जाति,गोत्र ,अधिकार आदि मानी होते हैं क्षेत्र या नारी के नाम से नहीं। यत बीज या वीर्य नर का है इसलिए उसका महत्व नारी से अधिक है।

ब्रम्हचर्य

ब्रह्मचर्य एक चेतना का विस्फोट है एक मानस क्रांति है जिसके बल पर मनुष्य अपना अभीष्ट पता है । प्राचीन गुरुकुलो में निर्दिष्ट नियमों में रहकर अध्ययन करना ब्रम्हचर्य कहा जाता था ।इसके पश्चात कुछ इस ब्रह्मचर्य आश्रम में रहकर तपस्यारत रहते थे तथा बहुत से गृहत आश्रम में प्रवेश होते है

(पुरुष रोग )प्रवृत्ति से ही समृद्धि प्राप्त होती है। किंतु यह जब समृद्धि मनुष्य को धर्म से विमुख कर उसके विवेक को हरण कर लेती है ,तो उसे इसका वास्तविक विकास नहीं हो पाता है। पाप से बचने हेतु अमित प्राप्ति के लिए परमात्मा की प्राप्ति हेतु ब्रम्हचर्य ही श्रेष्ठ उपाय हैं। ब्रंहाचार्य के पालन शास्त्र के अनुसार निम्नलिखित उपाय है

  • आयु बढ़ाने हेतु ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है
  • संपूर्ण आहार बिहार पर पूर्ण ध्यान दिया जाना चाहिए
  • उचित समय पर विवाह के पश्चात भी समय पूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए
  • ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संपूर्ण उत्तम दिनचर्या का निर्वाह करें
  • तामसी भोजन का सर्वथा त्याग आवश्यक है
  • नियमित व्यायाम आसन प्राणायाम करें
  • महीने में कम से कम दो उपवास (एकादशी) अवश्य करें
  • कुसंगति का सर्वथा त्याग करें
  • महापुरुषों और ब्रह्मचारियों के चरित्रों का मनन करें
  • मां को सदैव उच्च पवित्र रखने का पूर्ण आवश्यक है
  • यथाशास्त्र सब में परमात्मा को मानकर बंधुता बनाए रखें
  • अपने निर्माण में समाज का विकास निहित है आते हो अपने निर्माण के लिए सदैव प्रत्यत्नशील रहे

मनुष्य की आयुर्वेद अनुसार संपूर्ण आयु को चार विभागों में बाटा गया है। इसमें बाल्यावस्था 6 से 12 वर्ष, 12 से 25 वर्ष युवावस्था, 25 से 40 वर्ष प्रौढ़ा अवस्था , 40 से 100 वर्ष वृद्धावस्था, अन्य अवस्था वेदों का ब्रह्मचर्य घनिष्ट संबंध है

पुरुष रोग

(पुरुष रोग )आज मानव समाज में सेक्स का उधम मचाया जा रहा है मुझ में इसमें युद्ध से भी ज्यादा भाई मालूम पड़ता है अहिंसा को हिंसा का जितना भय है। उससे ज्यादा कामवासना का है।

जिसका वीर्य अर्थात अल्प वीर्य युवक अपनी से बड़े आयु वाले संबंधी एवं साधारण व्यक्तियों के सम्मुख भी सहज से उठना और बैठने और वार्तालाप करने में अधिकतर बचने की चेष्टा करते हैं। अर्थात ऐसी युवक लज्जित हुए अपराधी के भांति नीचे दृष्टि के साथ मुंह छुपा कर अपने से बड़ों के सामने बातचीत करते हुए पाए जाते हैं अधिकतर ए से युवक देखे जाते हैं जो सीना तानकर चलते हुए और वार्तालाप चपलता एवं तीव्रता के साथ करने का प्रदर्शन करते हैं किसी समाज उन्हें शुद्ध पवित्र और निर्दोष बल वीर्य और तेज वाला समझे। अर्थात फीकी फीकी सी हो जाती है मुख प्रतीत होता है आता ऐसे युवक भारतीय-फटी के क्रीम पाउडर द्वारा अपने मुखो की आभा बनाए रखने के लिए प्रयत्न नहीं करते रहते हैं परायणित कपल भीतर की और धसी और कपोल की हड्डियां दिखने लगती है । सर के बाल अल्पायु में झड़ने लगते हैं वह श्वेत होने लगते हैं यह वायु शुक्र चिंता के कारण है अर्थात वीर के कमी के कारण होता है प्रातः सोच के पक्ष तथा आज समय में दिन में अनेकों बार खाने से झूठी भूख निर्बलता के कारण यह ऐसे युवक में अनुभव होते हैं ए से युवक को कास्ट बताता यानी कब्ज बना रहता है मदग्नि और अपच सदा बना रहती है यह रोगों को नींद अधिक रात्रि बीत जाने के पश्चात आती है बहुत बार न्यू नहीं आती है किंतु जगाने पर आलस के कारण उठकर बैठना भी कठिन प्रतीत होता है

ऐसी(पुरुष रोग ) युवक का वीर्य जल सदृश पतला पड़ जाता है मूत्र करते समय यदा कदा वीर्य की कुछ बूंदे टपक जाया करती है वह मूत्र वेग को रोकना कठिन हो जाती है हाथ पैरों में और शरीर की नस- दुखती है तथा हाथ पैरों में शिथिलता चढ़ना सनसनी की प्राय होती है हाथ पैरों के पंजे एवं उंगलियां शीत ऋतु में एकदम ठंडे पड़े रहते हैं और ग्रीष्म ऋतु में एकदम अधिक गर्म अर्थात जलते हैं पैरों के तलवे एवं हाथों की हथेलियां का अधिक पसीजते रहना भी प्राय पाए जाते है क्षीण वीर्य या दूषित वीर्य वाले युवकों में पाए जाते हैं हाथ पैरों में कंपन एवं निजीवर्ता सी बनी रहती है युवक को नाटक उपन्यास या सिनेमा की पत्रिकाएं पढ़ने और अश्लील एवं नग्न चित्र देखने में अभिरुचि होती है स्त्रियों से बातचीत करने में अधिक रुचि होती है छिपी दृष्टि से उनकी ओर देखकर देखते रहने से इनको अधिक आनंद मिलता है वीर्य को अनुचित प्रकार से निसरन करने वालों के हृदय की धड़कन अधिक बढ़ जाती है चढ़ने उतरने तेज चलने एवं बातचीत करने तक से भी सांस की हृदय की धड़कन बढ़ जाती है ऐसे युवक बड़ी-बड़ी आशाओं के परिणाम के साथ ही किसी भी कार्य को प्रारंभ करके प्रारंभ प्रारंभ किए हुए कार्य को अंत तक न पहुंचकर उन्हें अधूरा छोड़ देते हैं अर्थात युगों के विचारों की देवता का प्रयास अभाव सा हो गया है मन में प्रति इरशाद देश का परिणाम स्वास्थ्य कुछ नहीं उखाड़ पाए हैं अपने जीवन में शास्त्रों की संख्या बढ़कर अपना ही व्यर्थ में मालिन और अपवित्र रहते हैं स्त्रियों का ध्यान करना ,वर्णन करने,उनके साथ हसने खेलने,

कामवासना की दृष्टि से देखने ,गुप्त रूप से वार्तालाप करने वाले, मन में संभोग की इच्छा एक विचार लाने वाले तथा उपयुक्त बातो के लिए मन में लगनशील बने रहने और साक्षात रूप से मैथुन क्रिया प्रवृत्त हो जाने वाले इन आठों प्रकार के मथुनो को संभोग कहा है

नपुंसकता क्यू होता है(पुरुष रोग )

परम पिता परमात्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए हर वस्तु का बीज बनाया है। जिस वस्तु का वह बीज होता है उससे वही वास्तु उत्पन्न होती है। यदि बीज उत्तम रोग रहित पुष्ट होता है तो उससे पौधा भी उत्तम स्वास्थ्य और पुष्ट पैदा होता है। यही हाल मनुष्य के शरीर में वीर्य का है वीर के बिना संतान की उत्पत्ति होना असम्भव है। जो पुरुष मैथुन करने में असमर्थ हो उसे नपुंसक या नामर्द कहा जाता है नपुंसकता नमर्द (पुरुष रोग )सात प्रकार की होती है

  • मानसिक नपुंसकता। (मन संबंधी नामर्दी)
  • पित्तज नपुंसकता। (पित्त वृद्धि के कारण
  • वीर्य झयजन्य (वीर्य नष्ट होने के रोग
  • रोग के कारण हुई नामर्दी
  • वीर वाहिनी नसों की कटनी से हुई नामर्दी
  • मैथुन ना करने की वजह से
  • जन्म से नामर्द

उपचार(पुरुष रोग )

  • असगंध का महीन चूर्ण बनाकर सेवन किया जाए तो इसे साधारण नपुसकता ठीक होती है
  • बरगढ़ का दूध बताशे में डालकर बताशा खाये
  • तुलसी का बीज खाया जाए तो वीर्य पुष्ट होती है और नपुस्कता का नाश होता है
  • स्वेत कनेर भीतर के महीन चूर्ण को एक रत्ती मक्खन के साथ सेवन करें और नित्य आधा रत्ती बढ़ाते हुए ७ रोज तक सेवन करें तो नपुंसकता सकता चली जाती है
  • पलाश के गोंद को खूब महान पीस कर रख ले और प्रतिदिन 6 माह से से एक तोला तक गाय के ताजा दूध के साथ मिश्री मिलाकर सेवन करें नपुंसकता खत्म हो जाती है
  • बरगद की फली एवं पीपल के फलों को छाया में सुख ले महीन कर एक तोला खाकर दूध पिए तो वीर्य से हुई नपुंसकता से काफी सुंदर कार्य करता है

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