प्राकृतिक चिकित्सा

jivan ki saral avm sugam rasta ro se bahne ke liye

इस संसार में करोड़ों प्राणी और जीव जंतु ऐसे हैं .जो बिना दवा खाए अपने रोग m ittaसकते है |और और अपनी जाति के खाने योग्य भोजन खाकर निरोग रहते हैं; वह केवल निरोगी ,नहीं बल्कि अपने शरीर में उत्तम बल और शक्ति भी पैदा कर लेते हैं1 इसके लिए अपने को बुद्धिमान समझने वाला और सृष्टि के सब प्राणी को अपने से श्रेष्ठ मानने वाला मनुष्य यदि जन्म से यही समझता है की औषधियां के बिना खाए रोग मिलते ही नहीं तुझे बड़े khed का विषय जीवन पर्यंत मनुष्य इसी भ्रम में पड़ा रहता है जहां किसी को कुछ शारीरिक व्याधि हुई अथवा जो शरीर बीमार होकर कोई खाट पर पड़ा हो अधिकांश व्यक्तियों के यही धारणा होती है की औषधि खाए बिना रोग दूर नहीं होते। मंदाग्नि भारी परिश्रम से चिता से दुराचारी से अथवा ऐसे ही अन्य किसी कारण से जिन लोगों का शरीर निर्बल और छीन हो गया है वह यही समझ लेते हैं

हम यह नही जानते की रोगी हमारी औषधि से अच्छे होते है या प्रकृति कृपा से| संभवत: उन्हें रोटी रूपी गोलियां ही अच्छा करती है प्रो। कार्सन।

प्रकृति की पुकार पर जो लोग ध्यान नहीं देते उन्हें तरह-तरह के रोग और दुख घेर लेते हैं परंतु पवित्र प्राकृतिक जीवन बिताने वाले जंगल के प्राणी रोग मुक्त रहते हैं और मनुष्य के दुर्गुणों और पापा चारों से भी बचे रहते हैं रिटर्न तू नेचर

इंद्रिय वश में न होना

जब यह बात स्थिर हुई कि लोगों का मूल कारण ही नष्ट करना उचित है तब log is बात पर विचार आरंभ किया कि रोगों का मूल कारण क्या है इस प्रश्न का समाधान का उन्हे यह मालूम हुआ कि अधिकांश लोग इंद्रियों के वश में होकर स्वास्थ्य संबंधी अनेक प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन कर जाते हैं जो पदार्थ खाने चाहिए और जिस रीति से खाने चाहिए उन्हें उसे रीति से न खाकर लोग अपनी जीव के साथ के अनुसार खान और ना खाने के अनेक पदार्थ खाने लग जाते हैं जैसे की इंजन में कोयला जलाया जा सकता है और या लकड़ी परंतु इंजन के साथ ही साथ यदि कूड़ा करकट धूल मिट्टी पत्थर कंकड़ आती इंजन में ठोक दी जाए तो us injan se dhuwa निकलेगा और काम भी ठीक ना होगा मनुष्य के शरीर के भीतर पेट भी एक इंजन है इस इंजन में शरीर को bal देने वाला सादा भोजन न पहुंचा कर जो मिले सो भला बुरा khane से होता या है की पेट की क्रिया बिगड़ जाती है और शरीर को विविध प्रकार के रोग आकार घेर लेते हैं

आरोग्य संबंधी नियमों का न पालन करना

रोगों का body में प्रकट होना कुछ प्राकृतिक नियम नहीं है बल्कि बल्कि आरोग्य संबंधी नियमों का पालन करने के कारण शरीर में जो जहर संचित हो जाता है उसे जहर को बाहर निकलने का पर्यटन जब प्राकृतिक करती है तभी शरीर में रोग प्रकट होते हैं इसलिए रोगों को दवा देने के लिए दवा खाने का व्रत में ऐसा है जिससे शरीर के भीतर से निकलने वाले जहर को रोककर शरीर में जमा रखना यदि घर में फन फैलाए हुए भयंकर सांप बैठा हो तो samachdari यही snake को पड़कर उसे घर से बाहर निकाल दे कहीं जंगल में छोड़ दे सांप को बाहर ना निकल कर उसके ऊपर डाल देने से आता उसके बिल को मिट्टी आदि से बंद कर देने से सर्प काbhay बिल्कुल नहीं मिट सकता सांप जो घर में ही है तो वह किसी ने किसी दूसरे रास्ते से बाहर निकल सकता और प्राणों को भय उपस्थित कर सकता हा

रोगों का कारण

माना कि तुम्हारे पास घड़ी है तो तुमने यह बात अच्छी होगी कि जब उसमें dhul भर जाता है अथवा उसके चक्र तथा उसे दूसरे आयोग पर जंग चढ़ जाती है फिर वह बिगड़ जाती है ठीक ठीक वक्त नहीं बतलाती बार-बार हम बात चलते-चलते रुक जाती है शरीर रूपी घड़ी की कल पूजा को यही आदर्श जब तक शरीर में मिल नहीं भरता तब तक पेट ठीक-ठाक काम करता है वह अच्छी तरह से उसी से 10 साफ होकर आता है खून भी सारे शरीर विवेक के साथ दौड़ का प्रतीक आरोन को पुष्टिविधियों को बनाए रखना है इसके आती रिक्त शरीर कि त्वचा पसीना निकलने का निकलने का काम अच्छी तरह से करती है फिर अपने बहुत सी से दवाई स्वास्थ्य के भीतर खींचकर खून को शुद्ध बनाए रखते हैं मस्ती के शांत रहने से चित्रकूट और बना रहता ह आलस नहीं भड़कने पता है चिड़चिड़ापन ग्लानि का कारण शुभ अन्य प्रकार के मनोविकार नहीं होने देते ना पड़ता वह शरीर दुख देने वाले की जब शरीर के कल पूजा में मेल भर जाता तब या पहले बात या होती की भोजन में रुचि नहीं रहती उसके उपरांत कब्ज होने के कारण पेट ना गाड़ी के समान हो जाता है खट्टी डाकले हाथी गले में और छाती में जलन पड़ती है सारे शरीर में ठीक ठीक खुलना दौड़ने का आयोजन पड़ जाते खाल पर फुंसी फोड़िया आदि निकल आती है सांस पूरा नहीं लिया जाता मस्तक तत्व रहती है हाथ और पैर ठंडे रहते हैं जहां पड़े फिर वहां से उठने का मन नहीं चाहता कम करने के लिए चित्र में उत्साह नहीं पैदा होता साधारण सी बात भी तबीयत छोड़ जाती है बिना किसी कारण के चित्र रहता है अच्छा नहीं मालूम होता है तरह-तरह के मानव अधिकार बढ़ाते हैं यह मालूम होने लगता है कि सही कैद खाना है अथवा बनती हुई भट्टी हैशरीर के भीतर में यदि थोड़ा सा उपयुक्त विकार कमजोरी के साथ प्रगट हो तो उसके बाद जो तो मेल बढ़ता जाएगा तो तो इन विकारों को जो भी अधिक होता जाएगा जिस तरह घड़ी को धूल वाली जगह पर रखने से इसमें मेलबॉर्ग जाता है काम में लेट रहने पर धातु के स्वभाव के कारण उसके पजों पर जंग चढ़ जाती है इस तरह हमारे शरीर 12 से में भरता है सहयोग निरंतर खींचते रहने से कितना भी शरीर के अंदर फीमेल वर्तई और शारीरिक आयोग के निरंतर घिसते रहने से कितना भी मेल शरीर के अंदर स्वयं इस में उत्पन्न हुआ करता है सुलगाई हुई लड़कियों जैसे खूब तेज आंच जैसे पीछे से थोड़ी सी रात छोड़ देती है इस तरह शरीर पोषण के लिए जो पदार्थ नित्य प्रति खा जाते हैं वह शरीर को यथोचित पोषण पहुंचने को प्राप्त थोड़ा संभल बाकी छोड़ देते हैं आते हुए शरीर के भीतर तीन प्रकार से मेल उत्पन्न हो जाता है एक तो बाहर दर्द खाद आदि मिट्टी खट्टी हो जाती है दूसरे शरीर पुष्टि के लिए कहेंगे

शरीर में मेल इकट्ठा होने के चिन्ह

जैसे कि अधिक मात्रा में भोजन करने के बाद सूट या पीपली का फंकी करने से भोजन आसानी से पच जाता है उसके पश्चात तीन-चार घंटे के बाद बहुत अधिक भूख लगती है कुछ लोगों का मत यह भी है कि मिर्च मसालेदार भोजन करने से हमारे भोजन को पचाने में के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन यह गलत बातें है जैसे कि एक गाड़ी में पांच छह लोगों को सवार हो जाने पर अधिक भोज होने के के कारण हमारा प्राचीन क्रिया कमजोर हो जाता है जिससे हमें अनेक बीमारियां उत्पन्न होती है जैसे की पैरों तथा हाथों में पसीना आना इस बात का प्रमाण है किस तरीके भीतर में एलिसा हो गए हैं इसी तरह हाथों पैरों का ठंडा रहना शरीर के भीतर मेल सांचे होने लगता है ऐसी अवस्था में शरीर के भीतर जमी हुई मेल को बाहर निकालने की कोशिश करनी चाहिए यदि दावों से रोका जाए तो इस तरह गला सूख जाने को उत्पन्न व्याधि हो जाता है या शरीर में उत्पन्न रोग हो जाता है कभी-कभी या फेफड़ों में हृदय में अथवा किसी भीतर आयोग में पहुंचकर उन आयोग में कोई ना कोई रोग उत्पन्न करते हैं खांसी का होना या कैफ बढ़ना शरीर में इकट्ठा हुए मेल का सूचक है खांसी वाले व्यक्ति यदि का अच्छी तरह से निकलता है तो उसे बहुत कुछ लाभ होता है क्योंकि यदि वह रीति के जैसा निकल रहा है तो यदि काफी सिरप का प्रयोग करके तो आप की खांसी ठीक हो जाती है पर जब दोबारा होने पर उसे खांसी पर दवा का कोई असर नहीं पड़ता है जब किसी को बेचैनी या शरीर के अंदर रोग हो जाते हैं तो समझ लेना चाहिए शरीर के अंदर मेल जमा हो गई है शरीर की आकृति में बदलना यानी चेहरा योजना होना सुस्ती रहना बैठे रहना कुछ काम करने की इच्छा ना होना चित्रण आदि यह सब शरीर के अंदर मेल जमा होने की सूचक है

शरीर में इकट्ठे हुए मल को निकालने की विधि

  • फेफड़ों के द्वारा
  • पेशाब के द्वारा
  • पसीने के द्वाराने
  • शौच के द्वार

फेफड़ों के द्वारा

जैसे कि हम देखते हैं।आजकल हम सांस सही तरीके से ना लेकर अपने फेफड़ों को कमजोर बनाते जा रहे हैं जिसकी वजह से हमारे शरीर के अंदर रोग उत्पन्न हो जाते हैं सबसे पहले हमें एक ध्यान अवस्था में बैठ जाना चाहिए कपड़े ढीले होना चाहिए और फिर नाक से धीरे-धीरे सांस लेना चाहिए पहले पेट को फिर सीने में हवा भरना चाहिए उसके बाद कुछ देर होल्ड करने से जब हमें उबाशाशी होने लगे तब धीरे-धीरे सांस को छोड़ना है आप रोजाना पांच से लेकर 10 मिनट तक दिल्ली करेंगे आप देखेंगे आपके अंदर एक नया ऊर्जा और नया ताकत आ गया है

पेशाब के द्वारा

आवश्यकता से अधिक जल पीना और धीरे-धीरे तरीके से पीना हमें जलकी से पीना है किस तरीके से पीना है उसके विषय में थोड़ा हम चर्चा करना चाहते हैं एक डेढ़ घंटे बाद पानी पीना चाहिए भोजन के लास्ट में पानी नहीं पीना चाहिए अब भोजन करते-करते एक घंट बीच-बीच में पीना चाहिए पानी और गलती से भी लास्ट में भजन के बाद पानी नहीं पीना चाहिए

पसीने के द्वारा

हमें रोजाना मेहनत करना चाहिए जिससे शरीर के अंदर जमी हुई पसीना निकल

शौच के द्वारा

शरीर के अंदर जितनी भी मैल सोच के द्वारा निकाला जाता है जैसे कि हम कोई भी अन्य खाते हैं तो उसका कुछ अंश हमारे पेट में रह जाता है तो जिससे हमारे पेट सड़ने लगता है जैसे हमें बुखार आ जाना खांसी आना आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं हमें जो हमारे अनुकूल भोजन है वही भोजन हमें करना चाहिए एक टाइम फिक्स होना चाहिए नियर टाइम पर भोजन करना चाहिए जिसके द्वारा हमारा पाचन तंत्र सही तरीके से काम करें मिर्च मसाला मांस मच्छी आदि सर्वदा त्याग देना चाहिए महीने में 2 दिन उपवास रहना चाहिए एकादशी को और एक दिन पेट साफ करने के लिए आयरन का तेल पीना या दूध में घी डालकर पीना

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