स्वास्थ्य के नियम

आज हम स्वथ्य के बारे में बात करेंगे। ,जैसे ,की हम रहने की के लिए मकान या कमरा खूब साफ होना चाहिए। और उसमे मकड़ी के जाले, और सड़ी गली चीजे ,मच्छर मक्खी न होने दे।मकान वा कमरा खूब साफ होना चाहिए। जीवन जिने का नियम आशुद्में वायु विशेषकर ऐसे वायु में, जिसमे रोगोत्पादक कीटाणुओं होने की संभावना हो ।वहा पर नही रहना चाहिए।

  • केवल शुद्ध जल, और खाद्य पदार्थो का ब्याहहार का प्रयोग करना चाहिए। अधिक ना खाइए,ताजा भोजन और सुन्दर पके फल अवश्य खाना चाहिए। भोजन धीरे धीरे ,और खूब चबाकर खाना नियमित रूप से पथ्य सहित खाना चाहिए। शरीर को स्वथ्य और पुष्ट और बलवान बनाने के लिए सदा और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।स्वाद के वशीभूत होकर स्वथ्य्र को खराब करने वाली चीजों को नही खाना चाहिए
  • भोजन करने से पहले हाथ पैर मुंह जरूर धोना चाहिए३दातुन
  • ३दातुन आदि जीभ और मसूड़े साफ करनी चाहिए
  • ४प्रतिदिन सुबह, साबुन या उबटन से नहाकर ,हाथ पैरो को साफ करना चाहिए।
  • आपने पेशे को ऋतु के अनुसार ढीले और साफ पहनने चाहिए
  • सूर्य के प्रकाश में रहना चाहिए
  • खुली हवादार में सोना,रात्रि को शीघ्र सोना और प्रताकाल ४बजे उठना चाहिए।अधिक से अधिक ८घंटे और कम से कम ६घंटा सोना चाहिए
  • छूत और उसके जहर से बचना चाहिए खूब शांत और प्रसन्नचित रहना चाहिए जहां तक हो सके चिंता नहीं करना चाहिए इससे स्वास्थ्य की बड़ी हानि होती है।1
  • उपरोक्त बातों को ध्यान में रखकर ईश्वर का वंदन और परोपकार करना चाहिए
  • सड़ा गला एवं दुर्गंध युक्त भोजन नहीं करना चाहिए संक्रमित रोगों में विशेष कर जल को गर्म करके पीना चाहिए2

जीवन जीने का नियम

*प्रातः काल तीन से पांच(जीवन शक्ति फेफड़ों से होती है)

थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एव प्राणायाम करना शरीर स्वस्थ एवं स्फूर्तिमान होता है ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले व्यक्ति उत्साही एवं बुद्धिमान होते हैं सोने वाले व्यक्ति की जीवन निस्तेज हो जाता है।

  • प्रातः काल 5 से( बड़ी आंत)। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7:00 बजे तक मल त्याग एवं स्नान कर लेना चाहिए। सुबह जो 7:00 बजे के बाद मल त्याग करते उनको अनेक बीमारियां होती है ।
  • सुबह 7 से 9 ( अमाशय यानी जठर)। इस समय भोजन के पूर्व ( २ घंटे से पहले) दूध या फलों के रस अथवा कोई भी पेय पदार्थ ले सकते हो।
  • ९से ११ (अग्नाश्य एवम प्लीहा)। इस समय भोजन के लिए उपयुक्त ह
  • ११ से १( हृदय में)। दोपहर 12 के आसपास मध्य संध्या करने के लिए हमारी संस्कृति में विधान है। भोजन वर्जित है
  • १से ३(छोटी आंत)। भोजन के करीब 2 घंटे बाद प्यास अनुसार पानी पीना चाहिए इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार रस शोषण होने में अवरोध करता है जिसे हमें रोग होता है ।
  • दोष 3 से 4 मूत्र से 2 से 4 घंटे पहले पिए पानी से इस समय मूत्र त्याग की प्रवृत्ति होती है ।
  • शाम 5:00 से ७(गुर्दे )। इस समय भोजन कर लेना चाहिए सूर्यास्त के 10 मिनट पहले 10 मिनट बाद तक करना चाहिए भोजन के 3 घंटे बाद सोते टाइम दूध पीना चाहिए
  • रात्रि 7 से 9 मस्तिक। इस समय मस्तिक सक्रिय रहता है आता प्रातः काल में पढ़ा हुआ और इस समय पढ़ा हुए पाठ जल्दी याद रहता है।
  • रात्रि 9 से 11 (रीढ़ की हड्डी मेरुरज्ज)। इस समय किन्हीं सर्वाधिक शरीर को विश्रांत प्रदान करती है इस समय का जागरण शरीर और बुद्धि को धक्का देती है
  • रात्रि 11 से एक 01 (पित्ताशय। इस समय का जागरण पित्त विकार अनिद्रा नेत्र रोग होता है और बुढ़ापा जल्दी आता है क्योंकि इस समय नई कोशिकाएं बनती है
  • 1 से 3(यकृत में)।

इस समय का जागरण पाचन तंत्र और लीवर को बिगाड़ देता है

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  2. ↩︎
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